Saturday, August 21, 2010

लिखी नज्में, अशार-ओ-गजलें, रुदादात कई ...
ज़िन्दगी सी लगी जिसकी किताबात कई.....


सुना है पढतें हैं अब लोग उसे कुरान सा....


(गुलज़ार साहब को समर्पित.......)






सर-ए-शाम किसी का इंतज़ार करने लगा हूँ मैं,
इश्क    का    रोज़गार    करने   लगा    हूँ     मैं.


आख़िरकार फ़ुरसत से मिली है फ़ुरसत मुझे ......
तमन्ना है तेरे बदन से यूँही चिपके रहे ताउम्र.....
तुम्हें चाहें, तुम्हें मांगे, तुम्हें चुमते रहे ताउम्र......


सो जाये खो जायें तेरे आगोश में जो नींद आ जाये....


(ऐ वतन)


तुम जो थी रोशन रहा मेरा कमरा देरतक...
सो न सकी जगती रही 'सुब्हा' देरतक...


रात रातभर खिडकियों पे ऊँघ के सो गयी....
इतनी पाक इतनी मासूम सूरत न देखी थी.
काफ़िर था, जब तलक तेरी मूरत न देखी थी.


देखते ही दाफ्तन जो कह उठा 'या अल्लाह'






यादों     से     रिश्ता    तोड़   नहीं   सकता...
तू चाहकर भी मुझे छोड़ नहीं सकता"....


मेरी परछाई में छिपकर जाने किसने कहा......
आ कि तेरे गुलाबी लबों का ज़हर चख लूं.
डूब जाऊं मैं झील में, तेरी नज़र चख लूं.


आ कि ऐ ज़िन्दगी तुझपे मरने की तमन्ना है.....
उँगलियों में उंगलियाँ उलझाती दिखी..
कभी सुलझी लटें सुलझाती दिखी.

ख़्यालों की गांठे खुलती ही नहीं.......
आजकल ख्वाबों में आने लगी है वो ....
इक नयी उम्मीद जगाने लगी है वो....


हथेली पर एक नयी लक़ीर उभरने लगी है...
टूटी उम्मीद और टपकती नज़रें.....
खाली    खाली    घर    है      दिल........

आजकल खंडहर सा लगता हूँ....
तुझे    अपनी   ज़िन्दगी   कहता   था......
जीने की वजह, हर ख़ुशी कहता था....


सुना है कल उसने ख़ुदकुशी कर ली......
उससे   देर तलक   कोई रूठे   भी तो    कैसे?
लब पे मासूम मुस्कराहट लिए वो जो कह दे....

'क्या    अभी    तलक    मुझसे    रूठे    हो........'
कभी मेरे दिल से अठखेली करती हैं.
कभी तेरे  दिल की चुगली करती हैं.


मेरी जान आँखें तेरी बहुत बातूनी हैं....



तू   मुझसे सचमुच   मिला था   या मेरा कोई ख़्वाब था.
वो    लम्हा    गुलदस्ते    में    मानिंद- ए- गुलाब    था.

अब चुभ रहे हैं जिसके खार हर लम्हा.....
एक नजूमें ने कहा है वो ज़रूर आएगी....

ज़िन्दगी में मौत लाजिम है, हुज़ूर आएगी....


मेरी जान मेंरा इंतज़ार बेसबब नहीं,,,,,,


तुम      अपनी    ज़रा    तलाशी      लो.

अपनी आँखों, धड़कनों से गवाही लो


लापता हूँ मैं कुछ दिनों से कहीं .....
चाँद      शबनम      हो      गया      पिघलकर

सूरज   बस राख   है इसमें   जल जल कर


ये इश्क़ नहीं आसां, एक आग का दरिया है.........
तू      मुझसे      रूठ      गया

एक       तारा     टूट      गया


मन्नतें पूरी हुईं ज़माने भर की.....
चार दिन का मुसाफ़िर हो गया.

राह है बस ज़िन्दगी से मौत तक.


कितना मुख़्तसर है सफ़र, ऐ इश्क तेरे बगैर.......
फ़ासला    ये    दो    क़दमों   का

तय हो न सका दो जन्मों में


कितना दुश्वार है तेरे घर का सफ़र.
देखा     न     जाने     उसने     किस    ढंग   से.

बेरंग ही उसने रंग दिया जाने किस रंग से.


कोई बताये मुझे ये नया रंग कौन सा है....
तुमने ने तो कहा था याद नहीं आओगे.

राह-ए-इश्क- पर साथ नहीं आओगे.


मेरी हिचकी कहती है, तुम झूठे हो.
मिलकर भी जो मिला नहीं

दूर जाकर भी जो गया नहीं


मेरी जान तू क्या पहेली है......
इतना बहुत है ताउम्र उसके इंतज़ार के लिए.

अपने इस यक़ीन पर ऐतबार के लिए.


कि वो हर बात बहुत सोच समझकर बोलता है.


तुझसे जुड़कर मैं सिफ़र हो गया

मुझसे घटकर तू सिफ़र हो गया

 
बहुत मुश्किल है ये हिसाब -ए- इश्क़
आज जो रौशनी हर सिम्त बेहिसाब है.

चांदनी अलग है, बदला बदला सा माहताब है.


रुख़ से सरका होगा पर्दा,शायद वो बेनक़ाब है.
बिखरे बिखरे से हैं, खोये खोये से हैं.

उलझे उलझे बालों को सुलझाते हुए ,


कैसी है उलझन कि सुलझती नहीं.


दांत से रेशमी डोर कटती नहीं.
दिल तो बच्चा है जी...थोडा कच्चा है जी..
ज़िद है उसकी गुज़ारिश है.

इक चाँद की ख्वाहिश है.


रौशनी, रेशम ख़्वाबों का लच्छा है जी.....


दिल तो बच्चा है जी...थोडा कच्चा है जी..
इश्क़ खिलौना मांगता है.

इश्क़ महंगा है, पर कब मानता है.


दिल तो बच्चा हैं ... थोड़ा कच्चा हैं ... जी !
उसके घर से मेरे घर के बीच दो क़दमों की दूरी है.
लेकिन दोनों के दरम्यान दुनिया भर की मजबूरी है.


इस इश्क से पहले ये सफ़र इतना दुश्वार तो न था.
हम करे जो क़त्ल तो दफ़ा ३०२ (तीन सौ दो).

वो करे अगर मक़तूल नाराज़ भी न हो.


सचमुच ये अन्धा क़ानून है.
थोड़ा फ़ायदा है, थोड़ा रिस्क भी,

अजब है हिसाब-ए-इश्क़ भी,



उससे जुड़कर मैं सिफ़र हो गया.
जिसे ढूंढता रहा ख्यालों में हर सुबह,

और शबभर खाबों में हर जगह,




वो छुपा रहा मेरी रूह में लापता.