Thursday, May 26, 2011

तुम्हारी गली की दो झांकती नज़रों ने चुराया होगा....
मुझे यक़ीन है कि तुम्ही ने उन्हें बताया होगा....

मेरे कुर्ते की बायीं जेब से दिल ग़ायब है.....
सर्दियों की एक भरी दोपहर

मेरी बाँहों की दुशाला ओढ़कर


सहर सोयी रही अलसायी सी...
लफ्ज़ लफ्ज़ है खुशबू जिसकी

रंग रंग अंदाज़ ए बयान


वो शख्स बोलता है फूलों की ज़ुबां.....
आदतन वो मुझसे सच नहीं कहती.....

आदतन मैं फिर भी करता हूँ यकीं....


ये इश्क की आदत बड़ी बुरी लत है......
सोते ख्वाबों में तुम हो, जगते ख्यालों में तुम हो....

दोनों के दरमियान बस तेरी ही बातें है.....


मिलेंगे तुमसे तब सनम, जब तुमसे कभी फुरसत हो............
देख लो पर देखने न दो.....

बस छुप छुप के नज़ारा करो....


तुम्हारी आदत भी फेसबुक सरीखी है....
कुछ पत्तों पर शबनम है.

कुछ से मेरी आँखें नम हैं.


कुछ बची निशानियाँ गीली रात की.....
दर्द बाक़ी है, ताज़ा है ज़ख्म अभी भी...
ग़मगीन आँखें है नम अभी भी...


सिर्फ कैलेण्डर बदलने से वक़्त नहीं बदलने वाला...