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My Scripts & त्रिवेणी.......
Monday, September 12, 2011
दहशतगर्दों के नाम एक त्रिवेणी:
हैरानी, बड़ी परेशानी, था एक दहशत में
ज़िम्मेदार वो ही इस कफ़न का था....
कफ़न के पीछे चेहरा उसकी बहन का था...
इश्क़ -ओ- इबादत का नाज़ हूँ मैं
पहले तेरा तलबगार था अब मोहताज हूँ मैं
मुहब्बत में मजबूर मक़बूल होता है........
बदन ओढ़कर गयी थी रूह....
बदन छोड़कर आई है......
ज़िन्दगी की यही कमाई है......
चव्वनी को श्रधांजलि:
मन्नत वो सवा रुपये चढाने की.......
हसरत ख़ुदा से तुम्हे पाने की.....
चव्वनी अपने साथ ले गयी....
Thursday, May 26, 2011
तुम्हारी गली की दो झांकती नज़रों ने चुराया होगा....
मुझे यक़ीन है कि तुम्ही ने उन्हें बताया होगा....
मेरे कुर्ते की बायीं जेब से दिल ग़ायब है.....
सर्दियों की एक भरी दोपहर
मेरी बाँहों की दुशाला ओढ़कर
सहर सोयी रही अलसायी सी...
लफ्ज़ लफ्ज़ है खुशबू जिसकी
रंग रंग अंदाज़ ए बयान
वो शख्स बोलता है फूलों की ज़ुबां.....
आदतन वो मुझसे सच नहीं कहती.....
आदतन मैं फिर भी करता हूँ यकीं....
ये इश्क की आदत बड़ी बुरी लत है......
सोते ख्वाबों में तुम हो, जगते ख्यालों में तुम हो....
दोनों के दरमियान बस तेरी ही बातें है.....
मिलेंगे तुमसे तब सनम, जब तुमसे कभी फुरसत हो............
देख लो पर देखने न दो.....
बस छुप छुप के नज़ारा करो....
तुम्हारी आदत भी फेसबुक सरीखी है....
कुछ पत्तों पर शबनम है.
कुछ से मेरी आँखें नम हैं.
कुछ बची निशानियाँ गीली रात की.....
दर्द बाक़ी है, ताज़ा है ज़ख्म अभी भी...
ग़मगीन आँखें है नम अभी भी...
सिर्फ कैलेण्डर बदलने से वक़्त नहीं बदलने वाला...
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सोते ख्वाबों में तुम हो, जगते ख्यालों में तुम हो.....
देख लो पर देखने न दो..... बस छुप छुप के नज़ारा करो...
कुछ पत्तों पर शबनम है. कुछ से मेरी आँखें नम हैं. ...
दर्द बाक़ी है, ताज़ा है ज़ख्म अभी भी... ग़मगीन आँखें...
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फ़क़ीर की झोली से - नज़्में
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